Navratri Pujan ki Vidhi, Kalash Sthapana Aur Upay


Ghatasthapana Muhurta 13th October = 06:54 am to 10:40 am

Ghatasthapana Muhurta falls on Pratipada Tithi
Pratipada Tithi Begins = 19:05 on 12/Oct/2015
Pratipada Tithi Ends = 21:31 on 13/Oct/2015

नवरात्री पर्व में मां दुर्गा के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा का विधान है।

सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है।

कलश / घट स्थापना विधि - सामग्री: —

जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र,
जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिटटी,
पात्र में बोने के लिए जौ ,
घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश,
कलश में भरने के लिए शुद्ध जल, गंगाजल,
मोली/कलेवा/हाथ पर रक्षा बंधन हेतु,
इत्र,
साबुत सुपारी,
कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के ,
अशोक या आम के 5 पत्ते,
कलश ढकने के लिए ढक्कन,
ढक्कन में रखने के लिए बिना टूटे चावल,
पानी वाला नारियल,
नारियल पर लपेटने के लिए लाल कपडा,
फूल माला.

प्रात: स्नानादि से निवृत हो कर संकल्प किया जाता है. व्रत का संकल्प लेने के पश्चात ब्राह्मण द्वारा या स्वयं ही मिटटी की वेदी बनाकर जौ बौया जाता है. कलश की स्थापना के साथ ही माता का पूजन आरंभ हो जाता है ..नवरात्र का श्रीगणेश शुक्ल पतिपदा को प्रातरूकाल के शुभमहूर्त में घट स्थापना से होता है।

घट स्थापना हेतु मिट्टी अथवा साधना के अनुकूल धातु का कलश लेकर उसमे पूर्ण रूप से जल एवं गंगाजल भर कर कलश के ऊपर नारियल को लाल वस्त्र/चुनरी से लपेट कर अशोक वृक्ष या आम के पाँच पत्तो सहित रखना चाहिए।

पवित्र मिट्टी में जौ के दाने तथा जल मिलाकर वेदिका का निर्माण के पश्चात उसके उपर कलश स्थापित करें। स्थापित घट पर वरूण देव का आह्वान कर पूजन सम्पन्न करना चाहिए। सबसे पहले जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र लें। इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब एक परत जौ की बिछाएं। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब फिर एक परत जौ की बिछाएं। जौ के बीच चारों तरफ बिछाएं ताकि जौ कलश के नीचे न दबे। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं।

अब कलश के कंठ पर मोली बाँध दें। अब कलश में शुद्ध जल, गंगाजल कंठ तक भर दें। कलश में साबुत सुपारी डालें। कलश में थोडा सा इत्र दाल दें। कलश में कुछ सिक्के रख दें। कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें। अब कलश का मुख ढक्कन से बंद कर दें। ढक्कन में चावल भर दें। नारियल पर लाल कपडा लपेट कर मोली लपेट दें। अब नारियल को कलश पर रखें। अब कलश को उठाकर जौ के पात्र में बीचो बीच रख दें।

अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें। “हे सभी देवी देवता और माँ दुर्गा आप सभी नौ दिनों के लिए इस में पधारें।” अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें। धूपबत्ती कलश को दिखाएं। कलश को माला अर्पित करें। कलश को फल मिठाई अर्पित करें। कलश को इत्र समर्पित करें। कलश स्थापना के बाद माँ दुर्गा की चौकी स्थापित की जाती है।

नवरात्रि व्रत के आरंभ में स्वस्तिवाचक शांति पाठ कर संकल्प करें और तब सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल, नवग्रह एवं वरुण का विधि से पूजन करें। फिर दुर्गा देवी का षोड़शोपचार पूजन करना चाहिए। दुर्गा देवी की आराधना अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कण्डेयपुराण के अनुसार श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मुख्य अनुष्ठान कर्तव्य है।

पाठ विधि - श्री दुर्गा सप्तशती पुस्तक का विधिपूर्वक पूजन कर इस मंत्र से प्रार्थना करनी चाहिए।

'नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्*।'

इस मंत्र से पंचोपचार पूजन कर यथाविधि पाठ करें।देवी व्रत में कुमारी पूजन परम आवश्यक माना गया है। सामर्थ्य हो तो नवरात्रि के प्रतिदिन, अन्यथा समाप्ति के दिन नौ कुंवारी कन्याओं के चरण धोकर उन्हें देवी रूप मान कर गंध-पुष्पादि से अर्चन कर आदर के साथ यथारुचिमिष्ठान भोजन कराना चाहिए एवं वस्त्रादि से सत्कार करना चाहिए।

।। नवरात्रि नौ दिन और नौ उपाय ।।

प्रथम नवरात्रि के दिन मां के चरणों में गाय का शुद्ध घी अर्पित करने से आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है। तथा शरीर निरोगी रहता है।

दूसरे नवरात्रि के दिन मां को शक्कर का भोग लगाएं व घर में सभी सदस्यों को दें। इससे आयु वृद्धि होती है।

तृतीय नवरात्रि के दिन दूध या दूध से बनी मिठाई या खीर का भोग माँ को लगाकर ब्राह्मण को दान करें। इससे दुखों की मुक्ति होकर परम आनंद की प्राप्ति होती है।

मां दुर्गा को चौथी नवरात्रि के दिन मालपुए का भोग लगाएं। और मंदिर के ब्राह्मण को दान दें। जिससे बुद्धि का विकास होने के साथ-साथ निर्णय शक्ति बढ़ती है।

नवरात्रि के पांचवें दिन मां को केले का नैवैद्य चढ़ाने से शरीर स्वस्थ रहता है।

छ: वीं नवरात्रि के दिन मां को शहद का भोग लगाएं। जिससे आपके आकर्षण शक्त्ति में वृद्धि होगी।

सातवें नवरात्रि पर मां को गुड़ का नैवेद्य चढ़ाने व उसे ब्राह्मण को दान करने से शोक से मुक्ति मिलती है एवं आकस्मिक आने वाले संकटों से रक्षा भी होती है।

नवरात्रि के आठवें दिन माता रानी को नारियल का भोग लगाएं व नारियल का दान कर दें। इससे संतान संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।

नवरात्रि की नवमी के दिन तिल का भोग लगाकर ब्राह्मण को दान दें। इससे मृत्यु भय से राहत मिलेगी। साथ ही अनहोनी होने की* घटनाओं से बचाव भी होगा।


"Nava-ratri" literally means "nine nights." During Navaratri, we invoke the energy aspect of God in the form of the universal mother, commonly referred to as "Durga," which literally means the remover of miseries of life. 1st - 3rd day of Navratri On the first day of the Navaratras, a small bed of mud is prepared in the puja room and barley seeds are sown on it. These initial days are dedicated to Durga Maa, the Goddess of power and energy.

4th - 6th day of Navratri During these days, Lakshmi Maa, the Goddess of peace and prosperity is worshipped.

7th - 8th day of Navratri These final days belong to Saraswati Maa who is worshipped to acquire the spiritual knowledge. This in turn will free us from all earthly bondage. But on the 8th day of this colourful festival, yagna (holy fire) is performed.

Mahanavami The festival of Navratri culminates in Mahanavami. On this day Kanya Puja is performed. Nine young girls representing the nine forms of Goddess Durga are worshiped.